रांची: झारखंड के दुर्गम जंगलों और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आज सुरक्षा बलों का जो प्रभाव दिख रहा है, उसके पीछे उन जांबाज अधिकारियों की रणनीति है जिन्होंने अपना करियर राज्य की शांति के लिए समर्पित कर दिया है। इनमें 2009 बैच के आईपीएस इंद्रजीत महथा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एक अत्यंत गरीब किसान परिवार से निकलकर भारतीय पुलिस सेवा तक पहुँचने वाले महथा की कहानी न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि उनके पेशेवर रिकॉर्ड भी राज्य की सुरक्षा में उनके गहरे योगदान की पुष्टि करते हैं।
संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि और प्रारंभिक जीवन
इंद्रजीत महथा मूल रूप से बोकारो जिले के चंदनकियारी प्रखंड के साबरा गाँव के निवासी है. उनका जन्म एक निर्धन परिवार में हुआ था, जहाँ आर्थिक तंगी के कारण उन्हें पुरानी और रद्दी किताबों से अपनी पढ़ाई करनी पड़ी। उनके पिता ने उनकी शिक्षा के लिए न केवल अपनी जमीन बेच दी थी, बल्कि वे उनकी पढ़ाई के लिए अपनी किडनी तक बेचने को तैयार थे। पिता के इसी महान त्याग और स्वयं की कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने अपने दूसरे प्रयास में यूपीएससी (UPSC 2009) परीक्षा पास की।
16 वर्षों का समर्पित सेवाकाल
महथा के करियर की सबसे बड़ी विशेषता उनका नक्सलवाद के विरुद्ध निरंतर और बेदाग संघर्ष रहा है।
- उनका लगभग 16 साल का सेवाकाल मुख्य रूप से नक्सल विरोधी अभियानों में ही बीता है।
- उन्होंने पलामू, सरायकेला और चाईबासा (पश्चिमी सिंहभूम) जैसे संवेदनशील जिलों में पुलिस अधीक्षक (SP) के रूप में कार्य किया है।
- रिपोर्ट्स के मुताबिक चाईबासा में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने 15 से अधिक मुठभेड़ों का नेतृत्व किया और 80 से अधिक नक्सलियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा।
चाईबासा और पलामू: सुरक्षा और विकास का संगम
महथा ने राज्य के सबसे चुनौतीपूर्ण जिलों जैसे चाईबासा (पश्चिमी सिंहभूम) और पलामू में बतौर पुलिस अधीक्षक (SP) कार्य करते हुए सुरक्षा के मोर्चे पर कई नवाचार किए।
रणनीतिक कैंपों की स्थापना
चाईबासा के एसपी रहते हुए उन्होंने सारंडा और पोरहाट जैसे दुर्गम जंगलों में रणनीतिक पुलिस कैंप स्थापित करने पर जोर दिया। इन कैंपों ने नक्सलियों के ‘सुरक्षित गलियारों’ को नष्ट कर दिया और सुरक्षा बलों को उन इलाकों तक पहुँचाया जहाँ पहले प्रशासन की पहुँच नगण्य थी।
नक्सल विरोधी कमान
उनके नेतृत्व में चाईबासा पुलिस ने पीएलएफआई (PLFI) जैसे प्रतिबंधित संगठनों के विरुद्ध सघन छापेमारी अभियान चलाए, जिसमें नक्सलियों के कई अस्थायी कैंप ध्वस्त किए गए और भारी मात्रा में हथियार व विस्फोटक बरामद किए गए।
सामुदायिक पुलिसिंग (Community Policing)
महथा का मानना रहा है कि नक्सलवाद को केवल बंदूक से नहीं, बल्कि विकास और विश्वास से ही जड़ से खत्म किया जा सकता है。
शिक्षा और स्वास्थ्य
उनके निर्देशन में सुदूरवर्ती गांवों में निशुल्क चिकित्सा शिविर आयोजित किए गए
जनसंपर्क
दुर्गम क्षेत्रों के आदिवासियों और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए खेल सामग्री, कपड़े और कंबल का वितरण किया गया
शिक्षा की पहल
उनके प्रयासों से कई दुर्गम क्षेत्रों में बच्चों के लिए स्कूल फिर से शुरू किए गए
टीम वर्क और उच्च अधिकारियों का मार्गदर्शन
किसी भी सुरक्षा अभियान की सफलता एक सामूहिक प्रयास होती है। उच्च अधिकारियों के कुशल मार्गदर्शन में उनकी टीम ने कई बड़ी सफलताएं हासिल की हैं।
- केंद्रीय गृह मंत्री दक्षता पदक (2025): उनके नेतृत्व और टीम की उत्कृष्ट रणनीति के लिए अक्टूबर 2025 में उन्हें इस प्रतिष्ठित पदक से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें झुमरा, लुगु और पारसनाथ की पहाड़ियों को नक्सलियों के प्रभाव से मुक्त कराने के सफल अभियानों के लिए मिला।
- ऑपरेशन मेगाबुरू (2025-26): सारंडा के जंगलों में चलाए गए इस वृहद संयुक्त अभियान में उनकी टीम ने 1 करोड़ के इनामी नक्सली ‘अनल’ सहित 17 हार्डकोर माओवादियों को ढेर किया।
वर्तमान जिम्मेदारी
वर्तमान में इंद्रजीत महथा झारखंड जगुआर (STF) में पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) के पद पर तैनात हैं।
उच्च अधिकारियों का मार्गदर्शन और टीम वर्क
एक पेशेवर रणनीतिकार के रूप में, महथा ने हमेशा टीम भावना को प्राथमिकता दी है। उच्च अधिकारियों के कुशल मार्गदर्शन में उनकी टीम ने झारखंड पुलिस के लिए कई गौरवशाली क्षण अर्जित किए हैं। उनकी टीम द्वारा झुमरा और पारसनाथ जैसी पहाड़ियों को नक्सलियों के दशकों पुराने कब्जे से मुक्त कराना एक ऐसी ही बड़ी सफलता है, जिसके लिए उन्हें ‘केंद्रीय गृह मंत्री दक्षता पदक’ (2025) से नवाजा गया है।
वर्तमान जिम्मेदारी: झारखंड जगुआर (STF)
आज वे डीआईजी झारखंड जगुआर (STF) के रूप में राज्य की सबसे विशिष्ट नक्सल विरोधी इकाई का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके अनुभव का ही परिणाम है कि राज्य अब अपने ‘नक्सल मुक्त’ होने के अंतिम लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।



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