श्रेणी: बायोग्राफिकल डॉक्यूमेंट्री / क्राइम एंड रिफॉर्म्स
रिपोर्ट: विश्वजीत कुमार पाण्डेय
एक दौर था जब झारखंड के जंगलों में पुलिस की गाड़ी का मतलब डर होता था। लेकिन आज उसी लाल गलियारे में एक नाम भरोसे का पर्याय बन चुका है। वह अधिकारी, जिसने बंदूकों की गूँज को विकास की आवाज़ में बदल दिया। यह सफर है संघर्ष, साहस और ‘सोशल पुलिसिंग’ के नायक आई.पी.एस. शैलेन्द्र प्रसाद वर्णवाल का।
प्रारंभिक जीवन और प्रेरणा
झारखंड की मिट्टी में जन्मे और पले-बढ़े शैलेन्द्र वर्णवाल ने राज्य की समस्याओं को किसी फाइल से नहीं, बल्कि अपनी आँखों से देखा था। एक मेधावी छात्र से लेकर 2010 बैच के आई.पी.एस. अधिकारी बनने तक का उनका सफर आसान नहीं था। उनकी ‘टफ जर्नी’ ने ही उन्हें यह सिखाया कि वर्दी सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम है।
नक्सलवाद का अंत
उनकी पहली बड़ी अग्निपरीक्षा जमशेदपुर (पूर्वी सिंहभूम) में हुई। यहाँ उन्होंने वह कर दिखाया जो दशकों से नामुमकिन लग रहा था। 2017 में, 25 लाख के इनामी कुख्यात नक्सली कानू मुंडा और उसके 10 साथियों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण उन्हीं की रणनीति का हिस्सा था।

- नक्सल सरेंडर पॉलिसी का प्रभावी क्रियान्वयन
- नोटबंदी के दौरान नक्सलियों की आर्थिक घेराबंदी
- पूर्वी सिंहभूम को पूरी तरह ‘नक्सल मुक्त’ जिला बनाने का श्रेय
कॉफी विद कॉप: एक सामाजिक क्रांति
पाकुड़ में उनकी पोस्टिंग ने पुलिसिंग का एक नया चेहरा पेश किया—’कॉफी विद कॉप’। पुलिस स्टेशन के बंद कमरों से निकलकर शैलेन्द्र गाँवों की चौपाल पर पहुँचे।

सिर्फ बातें नहीं, बल्कि काम। उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों के 10,000 से अधिक बेरोजगार युवाओं के लिए फिजिकल ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए। परिणाम स्वरूप, आज ये युवा बंदूक थामने के बजाय देश की सुरक्षा एजेंसियों और निजी कंपनियों में सम्मान के साथ काम कर रहे हैं।
सम्मान और मान्यता
उनके इस ‘ह्यूमन सेंट्रिक पुलिसिंग’ मॉडल को पूरे देश ने सराहा। 2018 में, विज्ञान भवन, दिल्ली में तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू द्वारा उन्हें ‘चैंपियंस ऑफ चेंज’ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

पुरस्कार का नाम: ‘चैंपियंस ऑफ चेंज’ (Champions of Change Award 2018)।
स्थान: विज्ञान भवन, नई दिल्ली।
प्रदानकर्ता: श्री एम. वेंकैया नायडू (तत्कालीन उपराष्ट्रपति, भारत)
चयन समिति: इस पुरस्कार के लिए उनका चयन भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा की अध्यक्षता वाली जूरी ने किया था।

इसी साल उन्हें समाज में शांति स्थापित करने के लिए ‘पीसमेकर ब्रेवरी अवॉर्ड’ भी दिया गया।
समय बदला, भूमिकाएं बदलीं। आज वे डी.आई.जी. (ए.सी.बी.) के रूप में झारखंड को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के मिशन पर हैं। लेकिन उनकी विरासत उन सुदूर गाँवों में आज भी गूँजती है, जहाँ अब डर नहीं, बल्कि ‘खाकी’ के प्रति सम्मान है।

एक तरफ खाकी की ताकत और दूसरी तरफ आदिवासियों की इच्छाशक्ति। आई.पी.एस. शैलेन्द्र वर्णवाल ने यह बखूबी समझा कि जंगल की रक्षा करने वाली 'लेडी टार्जन' जमुना टुडू जैसे लोग ही पुलिस की असली ताकत हैं। उन्होंने न केवल उन्हें सम्मानित किया, बल्कि उनके मिशन को प्रशासन का मजबूत कंधा भी दिया|
| श्रेणी | आई.पी.एस. शैलेन्द्र वर्णवाल | जमुना टुडू |
| मुख्य भूमिका | डी.आई.जी., ए.सी.बी. झारखंड | पर्यावरण कार्यकर्ता / पद्म श्री |
| कार्यक्षेत्र | कानून व्यवस्था और सोशल पुलिसिंग | वन संरक्षण और माफिया के खिलाफ संघर्ष |
| प्रमुख सम्मान | चैंपियंस ऑफ चेंज, पीसमेकर अवॉर्ड | पद्म श्री |
आई.पी.एस. शैलेन्द्र प्रसाद वर्णवाल की कहानी हमें याद दिलाती है कि एक अकेला व्यक्ति, यदि उसमें संकल्प और संवेदनशीलता हो, तो वह पूरे समाज का भविष्य बदल सकता है।



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