झारखंड की राजनीति में ‘टाइगर’ के नाम से मशहूर चंपई सोरेन आज एक ऐसे दोराहे पर खड़े हैं, जहाँ उनकी दहाड़ अपनों के बीच ही दबी हुई महसूस हो रही है। झामुमो (JMM) छोड़कर भाजपा का दामन थामना उनके करियर का सबसे बड़ा जुआ था, लेकिन मौजूदा हालात इशारा कर रहे हैं कि यह दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है।
सत्ता का संघर्ष और पहचान का संकट
चंपई सोरेन मूलतः एक ‘आंदोलनकारी’ नेता हैं। झामुमो में उनका कद मुख्यमंत्री के पद तक पहुँचा, लेकिन भाजपा के अनुशासित और कैडर-आधारित ढांचे में वह शायद खुद को ‘फिट’ नहीं कर पा रहे हैं।
- संगठनात्मक उपेक्षा: भाजपा में निर्णय लेने की प्रक्रिया शीर्ष स्तर से होती है। चंपई का यह कहना कि “बिना सलाह लिए उम्मीदवार तय कर दिया गया,” यह दर्शाता है कि भाजपा अब उन्हें एक क्षेत्रीय छत्रप के बजाय केवल एक ‘स्टार प्रचारक’ की तरह देख रही है, जिसका असर अब कम हो चुका है।
कोल्हान की जमीन खिसकना: एक बड़ा झटका
भाजपा ने चंपई को इसलिए अपनाया था क्योंकि कोल्हान क्षेत्र (जमशेदपुर, सरायकेला, चाईबासा) में उनकी तूती बोलती थी। लेकिन: - उपचुनाव का परिणाम: बेटे बाबूलाल सोरेन की हार ने चंपई की ‘विरासत’ पर सवालिया निशान लगा दिया है।
- वोट बैंक का खिसकना: आदिवासी समुदाय में यह संदेश गया कि चंपई ने ‘व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा’ के लिए विचारधारा छोड़ दी। भाजपा को उम्मीद थी कि चंपई आदिवासी वोट लाएंगे, लेकिन हुआ इसके उलट—भाजपा का कोर वोटर भी संशय में रहा।
‘बीजेपी-हेमंत’ की नजदीकी की सुगबुगाहट
सियासत में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता। यदि भाजपा वास्तव में हेमंत सोरेन के प्रति नरम रुख अपनाती है, जैसा कि चर्चा है, तो चंपई सोरेन के पास ‘नो मैन्स लैंड’ (बीच मझधार) में फंसने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। भाजपा के लिए चंपई का इस्तेमाल हेमंत को कमजोर करने के लिए था; यदि हेमंत ही साथ आ गए या समझौता हो गया, तो चंपई की उपयोगिता शून्य हो जाएगी।
आगे के तीन संभावित रास्ते: - 1. भाजपा में ही ‘मौन’ समर्पण: चंपई नाराजगी के बावजूद पार्टी में बने रहें और किनारे (Side-line) किए जाने को स्वीकार कर लें। यह उनके कद के नेता के लिए राजनीतिक आत्महत्या जैसा होगा।
- 2. घर वापसी की कोशिश: राजनीति में नामुमकिन कुछ नहीं है, लेकिन हेमंत सोरेन और झामुमो का शीर्ष नेतृत्व उन्हें वापस लेगा, इसकी संभावना फिलहाल कम है। उनकी जगह अब पार्टी में नई लीडरशिप तैयार हो चुकी है।
- 3. नई राह या क्षेत्रीय मोर्चा: क्या चंपई अपने अपमान का बदला लेने के लिए कोल्हान में कोई नया मोर्चा खोलेंगे? यह जोखिम भरा है, लेकिन ‘टाइगर’ के पास अपना अस्तित्व बचाने का यही आखिरी रास्ता हो सकता है।
निष्कर्ष: चंपई सोरेन का “ठहर कर बात करेंगे” कहना एक बड़े तूफान से पहले की शांति हो सकती है। फिलहाल, वह भाजपा के लिए एक ऐसी संपत्ति (Asset) बन गए हैं, जिसकी ‘मार्केट वैल्यू’ गिर रही है। अगर भाजपा ने उन्हें सम्मानजनक विदाई या जिम्मेदारी नहीं दी, तो झारखंड की राजनीति में एक और ‘पूर्व मुख्यमंत्री’ गुमनामी के अंधेरे में खो सकता है।



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