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जमशेदपुर की पूर्वी और पश्चिमी सीट पर क्यों गिरा वोटिंग परसेंटेज…किसे होगा नुकसान ?

जमशेदपुर की दो सीटों पर पिछले चुनाव के मुकाबले वोटिंग परसेंट में बड़ी गिरावट आई है….पिछले चुनाव में जमशेदपुर पूर्वी में 1,90,584 (59.5%) वोटर्स ने वोट डाला था…इस सीट पर इस बार वोटिंग परसेंट 55.95% रहा…यानी 3.55 % कम मतदान बात जमशेदपुर पूर्वी की करें तो 1,72,407 (62.5%) वोट पड़े थे…लेकिन इस बार सिर्फ 56.72% वोटर्स पोलिंग बूथ तक पहुंचे…यानी 5.78 % कम मतदान

सवाल है कि कम मतदान का फायदा किसे मिलेगा…नुकसान किसे होगा….जमशेदपुर पूर्वी में मुकाबला कांग्रेस के डॉक्टर अजय कुमार और बीजेपी की पूर्णिमा साहू के बीच है….पूर्णिमा साहू पूर्व सीएम रघुवर दास की बहू हैं…. लेकिन इस सीट निर्दलीय कैंडिडेट शिवशंकर सिंह ने बीजेपी के लिए मुकाबला और मुश्किल बना दिया….सवाल है कि इस शहरी सीट पर वोटर्स ने EVM का बटन दबाने में क्यों दिलचस्पी नहीं दिखाई….इस सीट को बीजेपी का गढ़ माना जाता रहा है….ऐसे में वोटर्स का घरों से नहीं निकलना बीजेपी के लिए निगेटिव
फैक्टर हो सकता है…..लेकिन वोटर्स का मूड समझना आसान नहीं होता….

जमशेदपुर पश्चिमी के मुकाबले में कांग्रेस औऱ जेडीयू है…..कांग्रेस के कैंडिडेट बन्ना गुप्पा हैं….जो सोरेन सरकार के सहयोगी हैं और हेल्थ मिनिस्ट्री जैसा बड़ा मंत्रालय भी संभाला है….वहीं बड़े नेता सरयू राय जेडीयू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं….जो झारखंड में NDA की सहयोगी है…..

वोटिंग प्रतिशत में अंतर का अलग-अलग तरीकों से विश्लेषण किया जा रहा है। कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि कम वोटिंग प्रतिशत बीजेपी के लिए नुकसानदेह हो सकता है, जबकि अन्य का मानना है कि इससे कांग्रेस को ज्यादा नुकसान हो सकता है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों का दावा है कि कम वोटिंग प्रतिशत हानिकारक हो सकता है।

इसके लिए हम मध्य प्रदेश का उदाहरण देखते हैं। 2013 के मुकाबले दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में तीन प्रतिशत ज्यादा वोट पड़े थे। बीजेपी का वोट प्रतिशत कांग्रेस से कुछ अधिक था। बढ़ा हुआ मतदान एंटी इनकंबेंसी या प्रो इनकंबेंसी को नहीं दर्शाता, क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी के वोट प्रतिशत लगभग समान थे। 2003 के विधानसभा चुनाव में लगभग 7.2 प्रतिशत ज्यादा वोटर टर्नआउट हुआ था, जिसके कारण बीजेपी ने कांग्रेस को हटाकर सरकार बनाई थी। जब टर्नआउट छह-सात प्रतिशत ज्यादा हो, तभी हम परिवर्तन की बात कर सकते हैं, लेकिन 2-3 प्रतिशत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता।जैसे एमपी में भाजपा की सरकार 2003 में बनी, उसके बाद 2008 के चुनाव में 2 परसेंट का इजाफा हुआ. फिर भी भाजपा की सरकार बनी. 2013 में फिर दो-तीन फीसदी का इजाफा हुआ फिर भी भाजपा की सरकार बनी रही. मतलब ये है कि मतदान प्रतिशत बढ़ता रहा फिर भी बीजेपी सरकार बनी रही. ये उदाहरण हमें समझने का अवसर देता है कि चाहे मतदान बढ़ जाए या घट जाए उसका कोई स्पष्ट कनेक्शन नहीं होता कि वो सत्ता विरोधी है या पक्ष में.

कई बार लोग राजनीतिक या सामाजिक कारणों से वोट डालने नहीं जाते। कभी-कभी टीना (देयर इज नो अल्टरनेटिव) फैक्टर भी काम करता है, यानी जब हम सोचते हैं कि किसी पार्टी का कोई विकल्प नहीं है, तो हमें लगता है कि वही पार्टी जीतेगी। इस सोच से लोग वोट नहीं डालते। कुछ मामलों में ध्रुवीकरण की वजह से वोटिंग बढ़ जाती है।

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